Thursday, June 18, 2009

बुढ़िया की व्यथा

परवरिश में भूल हुई क्या, न जाने
ढलती उम्र में बच्चे आँख दिखाते हैं
नाजों से पाला था जिनको, न जाने
क्यूँ अब सहारा बनने से कतराते हैं
निवाला अपने मुंह का खिलाया जिनको, न जाने
क्यूँ वे आज साथ खाने से घबराते हैं
सारा दर्द मेरे हिस्से और खुशियाँ उनके, न जाने
क्यूँ वे अब भी दर्द मेरे हिस्से ही छोड़ जाते हैं
उनकी पार्टी मानती है रोशनी में और मेरी साम अँधेरी कोठरी में, न जाने
क्यूँ वे हर बार मुझे ही शामिल करना भूल जाते हैं
उम्र के साथ कमजोर हुई मेरी सोच, न जाने
क्यूँ वे आज मुझे याद करने से डर जाते हैं

जीवन के आखिरी सफर में चेहरे सबके देखने की हसरत में, न जाने
क्यूँ मेरे अपने विदेश में बैठ जाते हैं
अपनी उखरती साँसों के समय साथ उनका चाहा मैंने, न जाने
क्यूँ वे काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं
उम्र भर सबको साथ लेकर चली मैं, न जाने
क्यूँ मेरी विदाई को वे गुमनामी में निपटाते हैं॥



Tuesday, May 26, 2009



ab hogi kavitaon ki bauchchar

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Tuesday, March 31, 2009

हमारे नेता

तन पर सफ़ेद कुरता मन पर ढेर सा मैला
ऐसे है हमारे नेता
कहते है जनसभा में चिल्लाकर वोट दो हमें
वोट दो हमें
हम दिख्लायेगे रास्ता तरक्की का विकास का
( अपनी )
वोट दो हमें हम दिलाएंगे आरक्षण
( और लड़ायेंगे तुम्हें )
वोट दो हमें और संसद भेजो हमको
(हम भूल जायेंगे तुमको) ॥

ज्ञानेंद्र कुमार
हिंदुस्तान, आगरा

Sunday, March 15, 2009

प्यार के नाम

अफसाना बनाने चला था मैं
उसको दीवाना बनाने चला था मैं
देख कर इक झलक उसकी
रूह_ऐ तमन्ना कह उठी
अब इबादत करूँ किसकी
खुदा की या उस चाँद की

दीवाना कर दिया उसकी इक नज़र ने
बेकरार कर दिया उसकी उसी नज़र ने
या खुदा मुझे कोई तो रास्ता बता दे
या वो रुख से नकाब उठा दे
या तू रुख से नकाब उठा दे

मेरी इक इल्तिजा मन मेरे मौला
मुझको मेरे महबूब का दीदार करा दे
दिखती है उसकी सूरत में तेरी सूरत
कुछ ऐसा कर मेरे मौला
उसके रुख से नकाब हटा दे

यदि देना है नज़राना तुझे मेरी बंदगी का
मेरी इबादत का मेरे रोजे का
मेरे मौला कर इशारा कुछ ऐसा
या तू देख मेरी ओर या नज़र उसकी मुझ पर कर दे

अब और किसी जन्नत का मुझे सबाब नहीं
उसके कदमों में मेरी जन्नत है मौला
बस इक आरजू है इल्तजा है
इक बार रुख से नकाब उठ जाए
मुझको मेरे खुदा का दीदार हो जाए
मुझको मेरे खुदा का दीदार हो जाए
मुझको मेरे खुदा का दीदार हो जाए।।

Saturday, March 7, 2009

अबकी फागुन

अबकी फागुन खेरे होरी
ओ गोरी
पहना दे मोहें बैयन का हार
नहीं करिबे तोहसे सवाल
बात मान मोरी
अबकी फागुन खेरे होरी
ओ गोरी

अबकी फागुन भीगें संग संग
ई है हमरी पहरी होरी
भिगिये अंचला चोली तोहरी
अबकी फागुन खेरे होरी
ओ गोरी

नाचे संग संग अंगना माँ
उद्हैबे रंग तोहपे करिबे सीनाजोरी
गुलाल अबीर के संग माँ
नैनों के तोहरी दर्पण माँ करिबे ठिठोली
अबकी फागुन खेरे होरी
ओ गोरी

Thursday, February 19, 2009

फूल

चाहे मन्दिर में माला पहनाओ
चाहे मस्जिद में चादर चढाओ
नहीं दिखता मुझमें कोई भरम
मैं फूल हूँ नहीं देखता जात और धरम

गर हो तुम्हारे घर शादी
या किसी के यहाँ मातम
चाहे खुशिओं में सजाओ
चाहे मइयत पर चढाओ
मैं फूल हूँ मुझमें है संयम

रब की चाहत मुझसे
खुशी का इजहार मुझसे
दोस्ती की फरमाइश मुझसे
दिलों का इकरार मुझसे
मैं फूल हूँ मुझमे हैं कई रंग

दिलों के खेल का हथियार हूँ मैं
रूठने मनाने का आधार हूँ मैं
न इर्ष्या न जलन सिर्फ़ सादगी है मुझमे
इसीलिए गम का भी इलाज हूँ मैं
मैं इसी में खुश हूँ मैं फूल हूँ, मैं फूल हूँ, मैं फूल हूँ॥

Tuesday, February 17, 2009

वो उम्मीद करते हैं मैं लिखूं तो उसमें गहराई हो

कैसे बतलाऊं मैं शुरू से शरू कर रहा हूँ॥

अकेला हूँ इस भीड़ भरी दुनिया में
पापा! मेरी ऊँगली पकड़ लो॥
आज चाहत हमारी नहीं कुबूल कर रहा ज़माना
हद तो तब हो गई जब तुमने भी मुंह मोड़ लिया

Friday, February 13, 2009

कैसे करूँ इज़हार

आंखों में हया उसकी

होंठों पर मुस्कान

याद दिलाती है उसकी

बेकरारी मेरी है

सताती है

तडपाती है

क्या करूँ मैं

कैसे करूँ इजहारे दिल

कैसे करूँ इकरारे प्यार

गुलाब दूँ

ख़त लिखूं

या मेरे खुदा

कोई और रास्ता बता दे॥

ज्ञानेंद्र

हिंदुस्तान, आगरा

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Sunday, February 8, 2009

सड़क

देखा है मैंने हर मंज़र हँसना, खेलना, इठलाना
तुम नन्हे क़दमों से दौड़ते हुए बाहर आती थी
तुम्हारा प्यारा सा चेहरा और वो मीठी शैतानियाँ
खिलखिलाती मुस्कान कैसे भूल जाऊं मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

कैसे भूल जाऊं मैं कल ही की तो बात थी जैसे
चलना सीखा था तुमने तो भागती थी मेरी ही तरफ़
वो नन्हे कदम बढ़ते थे मेरी ओर फिर घर की ओर
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

वो पहली बार जब मुझ पर गिरी थी तुम
साईकिल से अपनी नौ साल की उम्र में
चोट लगी थी तुमको, दर्द महसूस किया मैंने
आंसू देखे थे तुम्हारी आँखों से बहते मैंने
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की


वो खेलना, वो दौड़ना, वो खिलखिलाना तेरा
ऊँगली छोड़ कर बाहर की ओर भागना तेरा
वो अल्हड वो मासूम सी चाहत तेरी
आइसक्रीम वाले को रोकना और घरवालों से झगड़ना तेरा
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

तुम्हारे पिता का दुलार, माँ का वो लाड
वो भाइयों से लड़ना तेरा फिर प्यार से मनाना भी तेरा
चलती साईकिल से गिरकर मुझ पर चोट खाना तेरा
वो खो-खो, वो कबड्डी, वो छुपाछुपी का खेल तेरा
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

जब खीचती थी रेखाएं सीने पे मेरे ईट से, चौक से, कोयले से
और खेलती थी खेल अपने ही ढंग के बड़े अजीब से
करती थी परेशान सभी को थोडी सी इमानदारी, थोडी बेईमानी से
लड़कपन की वो उम्र, अल्हड वो हँसी
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

मैं ही तो रोज करती थी हिफाजत उसकी
स्कूल छोड़ना, घर लाना बन गई जिमेदारी मेरी
नन्हे क़दमों से चलकर आती थी वो मेरे पास
मुझसे मिलकर ही होती थी वो बस पर सवार
उसके जाने की बेकरारी और लौटने का इन्तजार
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की


अब सायानी हो गई है बिटिया मेरी लेकिन नहीं गया लड़कपन
देर शाम तक साइकिल का पहिया घुमाकर गुदगुदाती है मुझे
अपने साथ दो और को साइकिल पर लाद दबाना चाहती है मुझे
कैसे बताऊँ कितना खुश हूँ मैं उन्ही नन्हे क़दमों की आहात यद् आती मुझे
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

कुछ दुखी हूँ मैं उम्र के साथ बदल रही सोच उसकी
नहीं है शायद अब कोई स्थान मेरा नजरों में उसकी
महसूस कर रही हूँ मैं उसके व्यवहार में यह बेरुखी
चलने लगी स्कूटी पे मेरी तरफ़ नहीं वो देखती
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की


दिन कैसे बीतते हैं कैसे बताऊँ
वो जो थी नन्ही परी हो गई सायानी गुडिया
विवाह भी उसका हो गया तय खुश थी वो और मैं भी
उसकी डोली मुझ पर ही तो चल कर आएगी
नाच, गाना, आतिशबाजी और खुशियों का वो सेहरा
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

आज एक अजब अनुभव हो रहा है पता नहीं
वो नन्हे कदम जो कूदते थे मुझ पर आज हो रहे विदा
वो खुस है और आंखों में आंसू भी कैसी है ये घड़ी
मत करना तुम अहसास अपने अकेलेपण का
जहाँ तुम जाओगी मैं रहूँगा साथ तुम्हारे सदा
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की

डोली से उतरेंगे जब पैर तुम्हारे आगमन को मैं रहूंगी तुम्हारे
क्योंकि नहीं भुला सकती मैं उन नन्हे क़दमों की आहत को
तुम भले मत देखो मेरी ओर पर मैं नहीं भूल सकती
वो चंचलता, वो भोलापन, वो सच्ची दोस्ती तुम्हारी
कैसे भूल जाऊँ मैं
गवाह हूँ मैं तेरी खुशियों तेरी ग़मों की


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Thursday, February 5, 2009

आज का हाल

अब कोई मुद्दा नही सिर्फ़ राजनीति है
कोई सिद्धांत विचारधारा नहीं
सिर्फ़ राजनीति है
लगाते रहे आरोप मुस्लिम नेता
विवादित ढाचा ढहाया किसने
आज कल्याण मुलायम साथ है
सिर्फ़ राजनीति है
नैतिक नहीं अवसरवादी है दोस्ती इनकी
दे रहे जनता को धोखा
सिर्फ़ राजनीति है
श्रीलंका ने माँगा भारत से सहयोग
प्रभाकरन को पकड़ने के लिए
हमने दिया हवाला अंतर्राष्ट्रीय दबाव का
सिर्फ़ राजनीति है
अब श्रीलंका के पास पहुच गए प्रणब
जताने लगे हक़ सौप दो प्रभाकन हमें
उसने की है हमारे नेता की हत्या
सिर्फ़ राजनीति है
करूणानिधि पर लगाया आरोप
राजीव की हत्या के मददगारों की मदद का
आज कांग्रेस करूणानिधि साथ हैं
सिर्फ़ राजनीति है
प्रज्ञा ठाकुर बंद है मकोका में जेल में
आडवानी चिल्ला रहे हन्दुत्य के खेल में
दब गयी चीखें जिनकी धमाकों के शोर में
जनता दुखी तस्त है नेता खूब मस्त हैं
सिर्फ़ राजनीति है
आ गया फिर मौसम चुनावों का
दिखेगा शोर इसमें विकास के दावों का
सभी पार्टियाँ बजायेगी अपना डंका
लोकलुभावन वादे नारे गूजेंगे
सिर्फ़ राजनीति है
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रस्तेय२मन्ज़िल.ब्लागस्पाट.कॉम

Wednesday, February 4, 2009

वसंत आ गया

कैसे छिपोगे
कैसे छिपापाओगे
अपने आने का संदेश
तुम्हारी चुलबुली शरारतें
इशारा कर देती हैं
तुम्हारे आगमन का
लाख छिपोगे फिर भी
गगन करेगा चुगली
भवरे, तितलियाँ और कोपलें
करेंगी तुम्हारा स्वागत
कैसे छिपोगे कैसे छिपापाओगे
रोक पाओगे
गाव की पगडंडियों से
चली सरिता को
रोक पाओगे
पीली ओध्रनी में
इठलाती हवाओं को
कैसे छिपोगे कैसे छिपापाओगे
मधुर मिलन की प्यास
जो कराएगी तुम्हारा अहसास
कैसे छिपोगे कैसे छिपापाओगे
रोक पाओगे
पत्तियों को चूमती
ओस को
मुंडेर पर बैठे
पंछियों के शोर को
जो गुनगुनायेंगे
प्रिया के संदेश को
हो जाओ सचेत
ऋतुराज आ गया
ऋतुराज आ गया ऋतुराज आ गया
वसंत छा गया

दीक्षांत तिवारी हिंदुस्तान, आगरा मीठीमिर्ची.ब्लागस्पाट.कॉम

Saturday, December 13, 2008

A Friend....

(A)ccepts you as you are
(B)elieves in "you"
(C)alls you just to say "HI"
(D)oesn't give up ! ! on you
(E)nvisions the whole of you (even the unfinished parts)
(F)orgives your mistakes
(G)ives unconditionally
(H)elps you
(I)nvites you over
(J)ust "be" with you
(K)eeps you close at heart
(L)oves you for who you are
(M)akes a difference in your life
(N)ever Judges
(O)ffer support
(P)icks you up
(Q)uiets your fears
(R)aises your spirit
(S)ays nice things about you
(T)ells you the truth when you need to hear it
(U)nderstands you
(V)alues you
(W)alks beside you
(X)-plains thing you don't understand
(Y)ells when you won't listen and
(Z)aps you back to reality


Friends फोरेवर...

Sunday, October 19, 2008

Thursday, October 9, 2008

विजयादशमी मुबारक


मन रुपी बुराई और अंधेरे का नाश ही है पुतला दहन


मथुरा में श्री राम विजय का एक द्रश्य

पहले दिन के शतकवीर बने पोंटिंग


भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज़ का पहला दिन पोंटिंग के नाम

ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी की
पहले दिन का स्कोर


ऑस्ट्रेलिया 254/४

माइक हसी 46*

ज़हीर खान 17.2-4-39-2 शर्मा 16-3-49-1

Wednesday, October 8, 2008

वाह ताज कहिये जनाब

ओल्य्म्पिक्स लन्दन 2012

Saturday, October 4, 2008

पत्रकारिता के दिखाए मापदंड

हिंदुस्तान वाराणसी के प्रमुख संवाददाता सुशिल त्रिपाठी की मौत पत्रकारिता जगत को झकझोर देने वाली है। पत्रकारिता के मापदंड क्या होने चाहिए इसके लिए युवा और प्रशिछु पत्रकारों को सुशिल त्रिपाठी से सीख लेनी चाहिए। पत्रकारिता व्यावसायिक हो गए है इसे तो अखबारों के मालिक भी कहने लगे है। पत्रकारिता टिकाऊ की जगह बिकाऊ हो गई है। ऐसे समय में सुशिल त्रिपाठी nayak bankar ubhre hai jinki jan tab gaye jab vo khabar ke liye pahadoin par gaye the aur unka pair phishal gaya. sushil aap to chale gaye lekin patrakarita jagat aapko yad rakhega. aapko rastey2manzil ki taraph se shradhanjali.